यह लघु पुस्तिका अभी कुछ दिन पहले एक प्रकांड (?) मार्क्सवादी चिंतक द्वारा विभिन्न ऑनलाइन फोरम्स पर किये जा रहे अनर्गल प्रलाप का उत्तर तो नहीं है फिर भी उनका यथा स्थान उल्लेख करते हुए यह बताने का प्रयास किया गया है कि जब तक आप अपने देश और संस्कृति की मूल भावना को नहीं समझेंगे,जब तक उसे सही अर्थों मे आत्मसात नहीं करेंगे ,आप अपनी विचारधारा का प्रसार नहीं कर पाएंगे।
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विजय माथुर / क्रान्ति / ई बुक / यशवंत माथुर
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Public (what does this mean?)